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Firecracker ban – A radical step which could have been implemented better!

Supreme Court has implemented ban on firecrackers in Delhi, by suspending sale of all fireworks before Deewali. This has unleashed ongoing criticism on social media, and many people have started linking this with religious sentiments. I am not going to go into the debate if this decision is right or wrong, as there are equally good arguments from both sides. But I can comment on the way it is implemented, and how this backlash could have been reduced to a larger extent. 
I am from Kolkata, and for many years, the government over there has taken few decisions which were correct for the greater good, but not liked by many. As those decisions were taken sensibly, and were not as harsh as this one, so the protest or backlash was also controlled. Some of these decisions were limiting the sale area of fireworks in a controlled and designated place, (now implemented by other states too) stopping people to celebrate Holi on major roads, and let the celebration happened in lanes only. Similar…
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ठग महात्मा - Hindi short story

वह एक बहुत शातिर ठग था। अपनी ठगी से उसने बहुत घन-संपत्ति इकट्ठा कर ली थी। परंतु आखिरी ठगी के बिगड़ जाने की वजह से उसे अपना शहर छोड़ कर भागना पड़ा। वह एक दूसरे शहर में बिना पैसे और रहने की जगह के, मारा मारा फिर रहा था। एक दिन उसने एक सेठ को ग़रीबों में खाना बांटते हुए देखा। उसका ठगी वाला दिमाग फिर सक्रिय हो चला, और वह उन ग़रीबों से हटकर एक तरफ निर्लिप्त होकर बैठ गया। सेठ ने पहले तो उसे नज़रअंदाज़ किया, फिर जब सभी ग़रीबों में बांटने के पश्चात भी खाना बचा रह गया, तो उसके पास जाकर उसे देने की कोशिश की। मैले से एक चद्दर में अपने को लपेटे, उलझे बाल और बढ़ी हुई दाढ़ी में बैठा, सेठ को खाना देते देखकर उसने कहा, “तू बहुत गरीब है। और तुझे जो चाहिए वह सिर्फ मुट्ठी भर अनाज दान करने से नहीं मिलेगा। अपने पापों का प्रायश्चित्त कर, उसी में भलाई है।”
सेठ अवाक रह गया। उसे यह समझ में नहीं आ रहा था, कि इस अजीब से दिखने वाले व्यक्ति को यह कैसे पता है कि वह किसी कारण से दान कर रहा है, और उसकी कोई अतृप्त इच्छा भी है। उसे लगा कि यह कोई बहुत पहुंचे हुए महात्मा है, जो उसके भाग्य से यहाँ उसे मिल गए है। उसने हाथ जोड़े…

Jio Phone’s manipulative launch

Jio Feature Phone is launched and everyone is going gaga about it. I also watched the entire presentation, but noticed many discrepancies during the demo. I was surprised when no news item or YouTube channels covering this event were pointing about these obvious manipulative tactics. So, I decided to put this article showing the manipulative launch in detail.

I am not going to cover the specs or details around the phone, as by now everyone has covered that already. So, let’s get straight to point, on the demo.

ऑफलाइन

“आप अपने प्रोफ़ाइल पर अपनी फोटो क्यों नहीं लगाते है?"
सुजाता अपनी सहेली की बात से डर गई थी। उसने अपनी खुद की कहानी बताई थी, कि कैसे उसे भी किसी अंजान व्यक्ति से सोशल मीडिया पर मित्रता हो गई थी, और बाद में उसने इसे ब्लैकमेल करने की कोशिश की थी। उसका घर उजड़ते उजड़ते रह गया था। उसके चाचा जी पुलिस में है, और उनकी वजह से वह उस ब्लैकमैलर के शिकंजे से बची थी। 

आज तीन महीने से वह राहुल से ऑनलाइन बाते करती थी। दोनों ने एक दूसरे की तस्वीर भी नहीं देखी थी। बस मोबाइल पर लिख कर बातें होती रहती। शादी के 15 वर्ष बाद उसे कोई ऐसा मिला था जिसके साथ वह एक बार फिर दिल खोल कर बाते कर सकती थी। दोनों की पसंद एक जैसी थी, और जितना कुछ उन्होंने एक दूसरे को बताया था, उसके अनुसार दोनों की जिंदगी भी एक जैसी थी। शादी के बाद लगभग 3-4 वर्षों तक वह अपने पति मनोज के साथ बहुत खुश थी। दोनों एक दूसरे को बहुत प्यार करते थे, साथ घूमना फिरना, घंटों तक बाते करते रहना, एक दूसरे को अच्छे से समझना; ऐसा लगता था मानो दोनों एक दूसरे के पूरक है। पर बाद में पता नहीं किसकी नजर लग गई, मनोज धीरे धीरे अपनी नौकरी में व्यस्त होते चले …

चीर हरण

“सखी, आज इतनी उदास क्यों बैठी हो?” कृष्ण ने द्रोपदी के समीप बैठते हुए प्रश्न किया। 
“सखा, आप सर्वत्र ज्ञाता है, फिर भी क्यों पूछते है?”, दुखित स्वर में द्रोपदी ने उत्तर दिया। कृष्ण के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान दौड़ गई। उन्होंने अपने दोनों हाथों से द्रोपदी के चेहरे हो थामा और स्नेह पूर्वक कहा, “यदि बात करोगी तो शायद मन हल्का हो जाए, इसलिए पूछा है।”
“आपको नहीं लगता की मृत्युलोक में आज भी औरतों को अपना सम्मान नहीं मिला है? आज भी उन्हें प्रताड़ित एवं अपमानित किया जाता है। पुरुष वर्ग आज भी या तो दुशाशन बनकर चीर हरण करता है, या फिर भीष्म पितामह की तरह चुप चाप देखता रहता है। मेरी रक्षा को तो आप आ गए थे, पर अब इन्हें कोई क्यों नहीं बचाता? क्या इनकी रक्षा आपका दायित्व नहीं है? क्या इतिहास में कृष्ण सिर्फ एक द्रोपदी की लाज बचाने के लिए याद किए जाएंगे? जबकि आज हजारों लाखों द्रोपदीयां अपनी लाज बचाने की नाकाम कोशिश कर रही है। हर दिन सकड़ों द्रोपदी चीर हरण का शिकार होती है। क्या जगत नारायण श्री कृष्ण का उनके प्रति कोई दायित्व नहीं है? क्या उनकी नियति में चीर हरण ही लिखा है?”, कहते कहते द्रोपदी का चेह…

अंतर्द्वंद

“मैं जा रही हूँ”, कहते हुए उसने उठने का उपक्रम किया। मैंने हिम्मत करके उसकी कलाई पकड़ ली। हमारे 2 वर्ष पुराने रिश्ते में मैंने पहली बार उसकी कलाई पकड़ी थी। वह एकबारगी चौक गई, और जल्दी से अपना हाथ छुड़ा लिया। “क्या करते हो? कोई देख लेगा तो?”, उसकी आवाज़ में स्पष्ट कंपन था। 
“मुझे किसी की परवाह नहीं है। मैं तुम्हें इस तरह जाने नहीं दूंगा। चलो मेरे साथ कलकत्ता चलो।“ मैंने भी अपनी कांपती आवाज़ में कहा। ऊपर से मैं बहुत हिम्मत दिखा रहा था, परंतु अंदर ही अंदर एक द्वंद्व चल रहा था। कहा ले जाऊंगा? कैसे रखूँगा? मेरी तो अभी नौकरी भी नहीं लगी है। रहने को अपना घर भी नहीं है, गाव के कुछ लोगों के साथ बासा में रहने वाला उसे कहाँ रखूँगा।

राष्ट्र गान का सम्मान या डर?

कुछ महीनों पूर्व मैं एक बंगला फिल्म “राजकाहिनी” देखने गया था। फिल्म बहुत अच्छी थी, और अब हिन्दी में भी बन रही है। मेरी ओर से सबको हिन्दी वाली फिल्म देखने की सलाह है। पर यह पोस्ट उस फिल्म या उसकी कहानी से संबन्धित नहीं है। उस फिल्म के अंत में हमारे राष्ट्र गान “जन गण मन” का असली बंगला गीत दिखाया गया है। जन गण मन को पहले बंगला में ही लिखा गया था। सिनेमा हाल में जब यह गाना शुरू हुआ, तब किसी को इसके जन गण मन होने का एहसास नहीं था। दरअसल यह गाना “जन गण मन” से शुरू नहीं होता है। दूसरी पंक्ति आते आते लोगों को पता चलने लगा, और असल राष्ट्र गान ना होते हुए भी लोग एक एक करके खड़े होने लगे। फिल्म का अंत बहुत दुखद और चौका देने वाला है। इसलिए गीत को पहचानने में थोड़ी देर लगी, पर 3-4 पंक्तियाँ होते होते सभी खड़े हो चुके थे। मैं खुद भी खड़ा हुआ था। तब सूप्रीम कोर्ट का कानून भी नहीं था और यह असल राष्ट्र गान भी नहीं था। पर पता नहीं क्यों, अंदर से इच्छा हुई खड़े होने की, और इस गीत को सम्मान देने की। भले ही यह असल राष्ट्र गान ना सही, पर अर्थ तो वही थे।